MP News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चार साल तक सहमति से बने संबंधों को दुष्कर्म नहीं मानते हुए केंद्रीय कर्मचारी के खिलाफ दर्ज रेप की FIR और लंबित आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी।
भोपाल- पब्लिक वार्ता,

न्यूज़ डेस्क। MP News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सहमति से बने संबंधों और दुष्कर्म के मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग अपनी स्वतंत्र इच्छा से लंबे समय तक संबंध में रहे हैं और सहमति किसी झूठे वादे, धमकी या दबाव के आधार पर नहीं ली गई है, तो ऐसे मामले में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर भोपाल निवासी एक केंद्रीय कर्मचारी के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म की एफआईआर और ट्रायल कोर्ट में लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने सुनाया।

यह निर्णय सहमति (Consent) और झूठे विवाह के वादे से जुड़े मामलों में कानूनी दृष्टिकोण को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता एक केंद्रीय कर्मचारी है, जिसके खिलाफ उसकी विवाहित सहकर्मी ने भोपाल के छोला थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।
महिला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2020 में आरोपी ने उसे नशीला पदार्थ पिलाकर दुष्कर्म किया। साथ ही शादी का झांसा देकर करीब चार वर्षों तक शारीरिक संबंध बनाए।
इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने दुष्कर्म का मामला दर्ज किया था और मामला ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन था।
हाईकोर्ट ने किन तथ्यों पर दिया फैसला?
सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों का विस्तृत परीक्षण किया।
कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता:
- शिक्षित और बालिग थी।
- पहले से विवाहित थी।
- उसका एक बच्चा भी था।
- वह जानती थी कि पति से विधिक रूप से तलाक लिए बिना आरोपी से विवाह संभव नहीं था।
अदालत ने यह भी माना कि दोनों के बीच लंबे समय तक सहमति से संबंध रहे और रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने महिला को ब्लैकमेल किया, धमकाया या झूठे विवाह के वादे से उसकी सहमति प्राप्त की।
अदालत ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि यदि दो बालिग बिना किसी दबाव, भय या झूठे प्रलोभन के अपनी स्वतंत्र इच्छा से लंबे समय तक संबंध में रहते हैं, तो केवल बाद में विवाद उत्पन्न होने से उस संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और ट्रायल कोर्ट में लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने का आदेश दिया।
फैसले का कानूनी महत्व
यह फैसला इस सिद्धांत को दोहराता है कि दुष्कर्म के मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाता है।
यदि सहमति स्वतंत्र रूप से दी गई हो और उसे धोखे, धमकी, दबाव या झूठे विवाह के वादे से प्राप्त न किया गया हो, तो अदालत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेती है।
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