Golu Devta Temple: चितई गोलू देवता मंदिर: चिट्ठी लिखते ही मिलता न्याय, घंटियों से गूंजती आस्था की अद्भुत परंपरा

चितई (अल्मोड़ा/उत्तराखंड)- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। Golu Devta Temple: देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड अपने अनोखे धार्मिक स्थलों और मान्यताओं के लिए जानी जाती है। इन्हीं में से एक है चितई गोलू देवता मंदिर, जहां श्रद्धालु न्याय की उम्मीद लेकर चिट्ठियां लिखते हैं और मान्यता है कि यहां की अर्जी खाली नहीं लौटती। न्याय के देवता के रूप में प्रसिद्ध अल्मोड़ा जिले में स्थित यह मंदिर भगवान गोलू देवता को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग “न्याय के देवता” के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने और अर्जी लगाने से व्यक्ति को न्याय मिलता है और उसकी मनोकामना पूरी होती है। कहा जाता है कि गोलू देवता भगवान भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं और कुमाऊं क्षेत्र में उन्हें राजा का दर्जा भी प्राप्त है। चिट्ठियों और घंटियों की अनोखी परंपरा इस मंदिर की सबसे खास परंपरा है—चिट्ठी लिखना। श्रद्धालु अपनी समस्या, प्रार्थना या न्याय की मांग को कागज पर लिखकर मंदिर में अर्जी के रूप में चढ़ाते हैं। कई लोग स्टांप पेपर पर भी अपनी अर्जी लिखते हैं। जब मनोकामना पूरी हो जाती है, तो भक्त मंदिर में घंटी चढ़ाते हैं। यही कारण है कि मंदिर परिसर में हजारों-लाखों घंटियां टंगी दिखाई देती हैं, जो आस्था और विश्वास की जीवंत मिसाल बन चुकी हैं। ऐसी है गोलू देवता की मूर्ति मंदिर में स्थापित गोलू देवता की प्रतिमा सफेद रंग की है और वे घोड़े पर सवार हैं। प्रतिमा में देवता पगड़ी धारण किए हुए हैं और उनके हाथ में धनुष-बाण है, जो न्याय और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु चितई गोलू देवता मंदिर की ख्याति देशभर में फैली हुई है। उत्तराखंड के अलावा अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं के साथ न्याय की गुहार लगाते हैं। Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित है। इसे अंतिम सत्य न मानें और अपने विवेक का उपयोग करें।

Railway News: 1 मार्च से UTS Ticket Booking App बंद, RailOne बनेगा नया प्लेटफॉर्म

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। Railway News: भारतीय रेलवे ने जनरल टिकट बुकिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले UTS Ticket Booking App को 1 मार्च 2026 से बंद करने का फैसला लिया है। अब यात्रियों को जनरल टिकट, प्लेटफॉर्म टिकट और रिजर्वेशन से जुड़ी सभी सेवाओं के लिए नए सुपर एप RailOne का उपयोग करना होगा। रेलवे के मुताबिक, RailOne एक वन-स्टॉप डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसमें टिकट बुकिंग के साथ-साथ कई इंटीग्रेटेड सेवाएं एक ही जगह पर मिलेंगी। RailOne ऐप में मिलेंगी ये सभी सुविधाएं नई RailOne एप में यात्रियों को एक ही प्लेटफॉर्म पर कई सुविधाएं मिलेंगी, जिनमें शामिल हैं— इसके अलावा यात्री IRCTC Rail Connect, NTES, Rail Madad और Food on Track जैसी सेवाओं को भी RailOne के भीतर ही एक्सेस कर सकेंगे। R-Wallet बैलेंस का क्या होगा? रेलवे ने स्पष्ट किया है कि UTS ऐप में मौजूद R-Wallet बैलेंस खत्म नहीं होगा। यात्री उसी लॉगइन आईडी और पासवर्ड से RailOne में लॉगइन करके अपने R-Wallet का बैलेंस उपयोग कर सकेंगे। जनरल टिकट पर मिलेगा 3% डिस्काउंट RailOne ऐप के जरिए जनरल टिकट बुक करने पर यात्रियों को 3% तक का डिस्काउंट दिया जा रहा है। यह ऑफर 14 जुलाई 2026 तक वैध रहेगा। डिस्काउंट पाने के लिए यात्रियों को डिजिटल पेमेंट करना होगा, जैसे— रेलवे का उद्देश्य: एक ही ऐप में सभी सेवाएं भारतीय रेलवे का उद्देश्य यात्रियों को एक आसान, सुरक्षित और एकीकृत डिजिटल अनुभव देना है, जिससे अलग-अलग ऐप्स की जरूरत खत्म हो और सभी सेवाएं एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल सकें।

EPFO Rules: तीन साल बाद बंद नहीं होता PF का ब्याज, 58 साल की उम्र तक मिलती रहेगी कमाई – EPFO ने दूर किया भ्रम

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। EPFO Rules: कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) को लेकर लंबे समय से चल रही एक बड़ी गलतफहमी पर EPFO ने पूरी तरह से विराम लगा दिया है। कई लोगों को अब तक यह भ्रम था कि नौकरी छोड़ने के तीन साल बाद PF खाते पर ब्याज मिलना बंद हो जाता है, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। EPFO के मौजूदा नियमों के अनुसार, नौकरी छोड़ने या बदलने के बाद भी EPF खाते में जमा राशि पर 58 वर्ष की आयु तक ब्याज मिलता रहता है, चाहे खाते में नया योगदान हो या न हो। यानी अगर किसी कर्मचारी ने नौकरी छोड़ दी है और PF की राशि नहीं निकाली है, तो वह पैसा खाली नहीं पड़ा रहता, बल्कि उस पर हर साल घोषित दर से ब्याज जुड़ता रहता है। उदाहरण से समझें नियम अगर कोई कर्मचारी 40 वर्ष की उम्र में नौकरी छोड़ देता है और अपना PF नहीं निकालता, तो उसे घबराने की जरूरत नहीं है। उसका EPF खाता अगले 18 वर्षों तक यानी 58 साल की उम्र तक ब्याज कमाता रहेगा। यह नियम सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होता है। 58 साल के बाद क्या होता है? EPFO के नियमों के मुताबिक, जैसे ही PF धारक की उम्र 58 वर्ष पूरी होती है, उसका EPF खाता ‘इनऑपरेटिव अकाउंट’ की श्रेणी में चला जाता है। इसके बाद उस खाते पर ब्याज मिलना बंद हो जाता है। इसलिए EPFO सलाह देता है कि 58 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद PF की राशि निकाल लेना ही बेहतर होता है। 58 साल तक नौकरी करने वालों के लिए अलग नियम जो कर्मचारी 58 वर्ष की आयु तक लगातार नौकरी में बने रहते हैं और रिटायर होते हैं, उनके लिए नियम थोड़ा अलग है। ऐसे कर्मचारियों के EPF खाते पर रिटायरमेंट के बाद अगले 3 साल यानी 61 वर्ष की आयु तक ब्याज मिलता रहता है। हालांकि 61 साल पूरे होते ही यह खाता भी इनऑपरेटिव हो जाता है। तीन साल वाला नियम क्यों बना भ्रम? पहले यह नियम था कि अगर EPF खाते में लगातार तीन साल तक कोई योगदान नहीं होता, तो उसे इनऑपरेटिव मान लिया जाता था। इसी वजह से यह गलतफहमी फैल गई कि तीन साल बाद ब्याज मिलना बंद हो जाता है। लेकिन EPFO ने इस नियम में बदलाव कर दिया है और अब इनऑपरेटिव खातों पर भी 58 साल की उम्र तक ब्याज दिया जाता है। क्या करना समझदारी है? अगर कोई कर्मचारी लंबे समय तक नौकरी में नहीं है और आगे योगदान की संभावना नहीं है, तो वह PF राशि को नए नियोक्ता के पास ट्रांसफर कर सकता है या नियमों के अनुसार निकाल सकता है। हालांकि, हड़बड़ी में PF निकालने की जरूरत नहीं है, क्योंकि 58 साल तक उस पर ब्याज मिलता रहेगा।

Budget 2026 Sasta-Mehnga: कपड़े, जूते से दवाओं तक सस्ताई, जानिए क्या होगा महंगा

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। Budget 2026 Sasta-Mehnga: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को संसद में आम बजट 2026 (Union Budget 2026) पेश किया। यह उनके कार्यकाल का लगातार 9वां बजट रहा। बजट भाषण में उन्होंने कई बड़े ऐलान किए, जिनका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ने वाला है। सरकार ने कई वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी घटाने की घोषणा की है, जिससे रोजमर्रा की कई चीजें सस्ती होंगी, वहीं कुछ सेक्टर्स में महंगाई भी बढ़ सकती है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार उन वस्तुओं पर ड्यूटी कम कर रही है, जो भारत में निर्मित होती हैं या जिनका देश में उत्पादन बढ़ाया जाना है। खासतौर पर लेदर, टेक्सटाइल, डिफेंस और ग्रीन एनर्जी सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया गया है। Budget 2026 में ये सामान होंगे सस्ते बजट के ऐलान के बाद निम्नलिखित वस्तुओं की कीमतों में राहत मिलने की संभावना है— सरकार ने व्यक्तिगत उपयोग के लिए आयात होने वाली वस्तुओं पर टैरिफ दर 20% से घटाकर 10% कर दी है, जिससे कई आयातित सामान सस्ते होंगे। मोबाइल, जूते और पढ़ाई पर मिलेगी राहत कच्चे चमड़े और इससे जुड़े उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी घटने से जूते, बेल्ट और बैग सस्ते हो सकते हैं। वहीं मोबाइल फोन में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स जैसे बैटरियों के सस्ते होने से मोबाइल फोन की कीमतों में भी गिरावट आ सकती है। बजट में विदेश में पढ़ाई करने वालों को भी बड़ी राहत दी गई है। टीसीएस (TCS) की दर 5% से घटाकर 2% कर दी गई है, जिससे विदेश में पढ़ाई करना सस्ता होगा। इसके अलावा स्पोर्ट्स से जुड़े उपकरणों पर भी कस्टम ड्यूटी घटाई गई है। इन सेक्टर्स में बढ़ सकती है महंगाई जहां एक ओर कई चीजें सस्ती होंगी, वहीं कुछ वस्तुएं महंगी भी हो सकती हैं। कस्टम ड्यूटी बढ़ने से इन सेक्टर्स में असर दिखेगा— इन उत्पादों की कीमतों में आने वाले समय में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर क्या कहता है बजट 2026? बजट 2026 में सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थ, ग्रीन एनर्जी और एजुकेशन को प्राथमिकता दी है। आम लोगों के लिए कई जरूरी चीजों को सस्ता करने का प्रयास किया गया है, जबकि कुछ सेक्टर्स में टैक्स बढ़ाकर राजस्व बढ़ाने की रणनीति अपनाई गई है।

UGC के नए नियमों पर बवाल: जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बने कानून का क्यों हो रहा विरोध, जानें पूरी रिपोर्ट

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। UGC New Rules: यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा 2026 में लागू किए गए नए नियम Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विरोध शुरू हो गया है। जहां एक ओर इन नियमों को जातिगत भेदभाव रोकने की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जनरल कैटेगरी के छात्र और संगठन इसे एकतरफा और भेदभावपूर्ण करार दे रहे हैं। क्या हैं UGC के नए नियम? UGC के नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। यह कमेटी SC, ST और OBC छात्रों से जुड़ी जातिगत भेदभाव की शिकायतों को सुनेगी और तय समय में उनका निपटारा करेगी।कमेटी में SC-ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी अनिवार्य होगी। इसका उद्देश्य कैंपस में समानता का माहौल बनाना और वंचित वर्ग के छात्रों के लिए योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना है। UGC को ये नियम क्यों लाने पड़े? ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद लाए गए हैं। वर्ष 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC को 2012 के पुराने नियमों को अपडेट कर सख्त और प्रभावी व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए थे।कोर्ट ने कहा था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न रोकने के लिए केवल दिशानिर्देश नहीं, बल्कि ठोस निगरानी तंत्र जरूरी है। किस रिपोर्ट के आधार पर बने नए नियम? UGC ने सुप्रीम कोर्ट और संसदीय समिति के सामने जो रिपोर्ट पेश की, उसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए।रिपोर्ट के अनुसार— हालांकि 90% से अधिक मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन पेंडिंग मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। वर्ष 2019-20 में जहां 18 मामले लंबित थे, वहीं 2023-24 में यह संख्या 108 तक पहुंच गई। नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा क्या है? UGC के नए नियमों में जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या अपमानजनक व्यवहार, जो उनकी गरिमा या शिक्षा में समानता को प्रभावित करे, उसे भेदभाव माना जाएगा। दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति या संस्था के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। विरोध और हंगामे की वजह क्या है? नए नियमों के खिलाफ जनरल कैटेगरी (सवर्ण) छात्र संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। उनका आरोप है कि नियमों में केवल SC, ST और OBC छात्रों के भेदभाव की बात की गई है, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्रों को संरक्षण से बाहर रखा गया है।विरोध करने वालों का कहना है कि इन नियमों का दुरुपयोग कर झूठी शिकायतें की जा सकती हैं, जिससे कैंपस में तनाव बढ़ेगा। इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है, जिसमें इसे UGC एक्ट और समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ बताया गया है। कुल मिलाकर क्या है पूरा मामला? UGC ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और अपने आंकड़ों के आधार पर नए नियम लागू किए हैं, जिनका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना है।लेकिन दूसरी ओर, जनरल कैटेगरी के छात्रों को आशंका है कि ये नियम एकतरफा हैं और उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकते हैं।यही वजह है कि देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इसे लेकर विरोध, प्रदर्शन और बहस तेज हो गई है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है।

UGC के नए नियमों पर बवाल: जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बने कानून का क्यों हो रहा विरोध, जानें पूरी रिपोर्ट

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। UGC New Rules: यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा 2026 में लागू किए गए नए नियम Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विरोध शुरू हो गया है। जहां एक ओर इन नियमों को जातिगत भेदभाव रोकने की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जनरल कैटेगरी के छात्र और संगठन इसे एकतरफा और भेदभावपूर्ण करार दे रहे हैं। क्या हैं UGC के नए नियम? UGC के नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। यह कमेटी SC, ST और OBC छात्रों से जुड़ी जातिगत भेदभाव की शिकायतों को सुनेगी और तय समय में उनका निपटारा करेगी।कमेटी में SC-ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी अनिवार्य होगी। इसका उद्देश्य कैंपस में समानता का माहौल बनाना और वंचित वर्ग के छात्रों के लिए योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना है। UGC को ये नियम क्यों लाने पड़े? ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद लाए गए हैं। वर्ष 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC को 2012 के पुराने नियमों को अपडेट कर सख्त और प्रभावी व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए थे।कोर्ट ने कहा था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न रोकने के लिए केवल दिशानिर्देश नहीं, बल्कि ठोस निगरानी तंत्र जरूरी है। किस रिपोर्ट के आधार पर बने नए नियम? UGC ने सुप्रीम कोर्ट और संसदीय समिति के सामने जो रिपोर्ट पेश की, उसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए।रिपोर्ट के अनुसार— हालांकि 90% से अधिक मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन पेंडिंग मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। वर्ष 2019-20 में जहां 18 मामले लंबित थे, वहीं 2023-24 में यह संख्या 108 तक पहुंच गई। नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा क्या है? UGC के नए नियमों में जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या अपमानजनक व्यवहार, जो उनकी गरिमा या शिक्षा में समानता को प्रभावित करे, उसे भेदभाव माना जाएगा। दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति या संस्था के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। विरोध और हंगामे की वजह क्या है? नए नियमों के खिलाफ जनरल कैटेगरी (सवर्ण) छात्र संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। उनका आरोप है कि नियमों में केवल SC, ST और OBC छात्रों के भेदभाव की बात की गई है, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्रों को संरक्षण से बाहर रखा गया है।विरोध करने वालों का कहना है कि इन नियमों का दुरुपयोग कर झूठी शिकायतें की जा सकती हैं, जिससे कैंपस में तनाव बढ़ेगा। इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है, जिसमें इसे UGC एक्ट और समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ बताया गया है। कुल मिलाकर क्या है पूरा मामला? UGC ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और अपने आंकड़ों के आधार पर नए नियम लागू किए हैं, जिनका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना है।लेकिन दूसरी ओर, जनरल कैटेगरी के छात्रों को आशंका है कि ये नियम एकतरफा हैं और उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकते हैं।यही वजह है कि देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इसे लेकर विरोध, प्रदर्शन और बहस तेज हो गई है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है।

MGNREGA का नाम बदला: लोकसभा से पास हुआ VB-G RAM G Bill, जानें जी राम जी का फुल फॉर्म और बड़े बदलाव

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता,न्यूज़ डेस्क। लोकसभा में मनरेगा (MGNREGA) से जुड़ा एक बड़ा और विवादित विधेयक पास कर दिया गया है। सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर VB-G RAM G Bill कर दिया है, जिसके बाद संसद से लेकर आम जनता तक में चर्चा तेज हो गई है। बिल के पास होते ही विपक्ष ने सदन में जोरदार हंगामा किया, जिसके चलते कार्यवाही कई बार बाधित रही। इस बीच सबसे ज्यादा सर्च किया जाने वाला सवाल बन गया है – VB-G RAM G का फुल फॉर्म क्या है? VB-G RAM G का फुल फॉर्म क्या है? VB-G RAM G का पूरा नाम है –Viksit Bharat Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) Bill, 2025 सरकार का कहना है कि यह नया कानून मनरेगा की जगह लेगा और ग्रामीण रोजगार व्यवस्था को नए ढांचे में मजबूत करेगा। क्यों बना VB-G RAM G Bill टॉप ट्रेंड? लोकसभा से बिल पास होते ही गूगल पर “VB-G RAM G Full Form”, “जी राम जी योजना क्या है” और “मनरेगा नया नाम” जैसे कीवर्ड तेजी से ट्रेंड करने लगे।नाम बदलने के साथ-साथ रोजगार, मजदूरी और भुगतान प्रणाली में प्रस्तावित बदलावों ने लोगों की जिज्ञासा बढ़ा दी है। MGNREGA की जगह क्या बदलेगा? सरकार के अनुसार, VB-G RAM G Bill सिर्फ मजदूरी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार और आजीविका सुरक्षा का व्यापक मॉडल है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों की बदलती आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई अहम संशोधन किए गए हैं। VB-G RAM G Bill में प्रस्तावित बड़े बदलाव विकसित भारत 2047 से कैसे जुड़ा है यह बिल? सरकार का कहना है कि VB-G RAM G Bill को विकसित भारत 2047 के विजन के तहत तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य सिर्फ रोजगार देना नहीं, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर और मजबूत बनाना है। आगे क्या होगा? लोकसभा से पास होने के बाद यह विधेयक अब आगे की संसदीय प्रक्रिया से गुजरेगा। हालांकि, मनरेगा की जगह लेने वाले इस नए कानून को लेकर राजनीतिक विवाद और जनचर्चा लगातार तेज होती जा रही है।

Ratlam News: रतलाम के कोच उमंग पोरवाल बने भारत के शुरुआती ISSF ‘A’ लाइसेंस प्राप्त कोच, मध्य प्रदेश से पहला नाम

रतलाम- पब्लिक वार्ता,न्यूज़ डेस्क। Ratlam News: रतलाम शहर ने भारतीय निशानेबाजी खेल में बड़ा मुकाम हासिल किया है। शहर के जाने-माने शूटिंग कोच उमंग पोरवाल ने ISSF ‘A’ लाइसेंससफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है। यह विश्व स्तर पर निशानेबाजी कोचिंग का उच्चतम प्रमाण-पत्र है, जिसे हासिल करने वाले भारत के शुरुआती कुछ कोचों में श्री पोरवाल का नाम शामिल हो गया है।वे मध्य प्रदेश से यह उपलब्धि प्राप्त करने वाले पहले कोच बने हैं। यह प्रमाण-पत्र उन्हें 10 सप्ताह के अंतरराष्ट्रीय हाई-परफॉर्मेंस ऑनलाइन प्रशिक्षण और उसके बाद कतर के दोहा में 8 दिवसीय ऑफलाइन रेजिडेंशियल मॉड्यूल में भाग लेने के बाद प्रदान किया गया। यह प्रशिक्षण ISSF वर्ल्ड कप फाइनल्स के साथ आयोजित हुआ, जहां विश्व के शीर्ष खिलाड़ी और कोच उपस्थित रहे। इससे पहले पोरवाल ISSF ‘B’ लाइसेंस (फ़िनलैंड, 2025) भी कर चुके हैं, जिसने उनके वैज्ञानिक और तकनीकी प्रशिक्षण की मजबूत नींव रखी। अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया शोध कार्यक्रम में श्री पोरवाल ने अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया, जिसका विषय था— “Physiological and Technical Correlates of Pistol Shooting Performance: A Field-Based Cross-Discipline Study Using Blood Pressure and SCATT Analysis” यह शोध ब्लड प्रेशर और SCATT डाटा के आधार पर प्रतियोगिता प्रदर्शन, फील्ड स्टडी और क्रॉस-डिसिप्लिन विश्लेषण से संबंधित था।प्रेजेंटेशन को अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और शीर्ष कोचों ने सराहा। प्रमाण-पत्र प्रदान करने वाले प्रतिष्ठित पदाधिकारी ISSF ‘A’ लाइसेंस पोरवाल को निम्न वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा प्रदान किया गया— आभार और समर्पण उमंग पोरवाल ने अपने अंतरराष्ट्रीय मेंटर्स—वेसा, कैरोलिना, आघी, जॉन, नेक्टारियोस और जैक,साथ ही सह-कोच साथियों का विशेष धन्यवाद दिया। उन्होंने यह उपलब्धि रतलाम जिला राइफल संघ (RDRA), अपने शूटर्स और परिवार को समर्पित करते हुए कहा— “यह उपलब्धि मेरी व्यक्तिगत सफलता से अधिक भारतीय निशानेबाजी की जिम्मेदारी है। जो ज्ञान, तकनीक और हाई-परफॉर्मेंस सिस्टम मैंने सीखा है, उसे अब मैं भारतीय खिलाड़ियों के भविष्य के लिए लागू करूंगा। रतलाम और मध्य प्रदेश के खिलाड़ी अब विश्व स्तरीय प्रशिक्षण का लाभ उठाएंगे।” शहर के विधायक एवं मंत्री चैतन्य कश्यप, महापौर प्रहलाद पटेल, अभिभावकों एवं संस्था सदस्यों ने इस उपलब्धि पर बधाई दी और इसे रतलाम के लिए गर्व का क्षण बताया।

Sanchar Saathi App: संचार साथी ऐप का प्री-इंस्टॉलेशन नियम खत्म: सरकार ने कहा—यूजर्स की बढ़ती स्वीकार्यता से लिया फैसला

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। Sanchar Saathi App: केंद्र सरकार ने Sanchar Saathi App को लेकर जारी विवादों के बीच बड़ा फैसला लेते हुए स्मार्टफोन्स में इसके प्री-इंस्टॉलेशन की अनिवार्यता को वापस ले लिया है। दूरसंचार मंत्रालय ने एक्स पोस्ट के जरिए यह जानकारी देते हुए साफ किया कि ऐप का उद्देश्य केवल साइबर सुरक्षा बढ़ाना है और अब उपयोगकर्ता अपनी इच्छा से इसे डाउनलोड व अनइंस्टॉल कर सकते हैं। सरकार बोली—ऐप की स्वीकार्यता बढ़ रही, इसलिए हटाई अनिवार्यता मंत्रालय ने कहा कि संचार साथी ऐप पूरी तरह सुरक्षित है और इसका मकसद लोगों को फ्रॉड कॉल, स्कैम और ऑनलाइन अपराधों से बचाना है। सरकार के अनुसार, ऐप की बढ़ती लोकप्रियता को देखने के बाद इसे प्री-इंस्टॉल करने की बाध्यता हटाने का निर्णय लिया गया। एपल ने जताई थी आपत्ति 28 नवंबर को जारी निर्देशों के बाद Apple ने सरकार के आदेश का पालन करने से इनकार किया था।कंपनी ने कहा था कि ऐप का प्री-इंस्टॉलेशन iPhone यूजर्स की प्राइवेसी के लिए खतरा बन सकता है। Apple ने रॉयटर्स से कहा था कि वे अपनी चिंताएं सरकार के सामने रखेंगे। सरकार ने विपक्ष के आरोपों को बताया बेबुनियाद प्री-इंस्टॉलेशन के आदेश के बाद संसद में राजनीतिक घमासान मच गया था। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लोकसभा में कहा कि संचार साथी ऐप से किसी भी तरह की जासूसी संभव नहीं है। यह ऐप सिर्फ जन सुरक्षा के लिए बनाया गया है। 1.4 करोड़ लोगों ने ऐप किया डाउनलोड सरकार के मुताबिक: यह ऐप के प्रति बढ़ते भरोसे और जागरूकता को दर्शाता है। संचार साथी ऐप क्यों है चर्चा में?

WhatsApp New Rules 2025: बिना एक्टिव SIM नहीं चलेगा WhatsApp, वेब यूजर्स के लिए हर 6 घंटे में ऑटो लॉगआउट अनिवार्य

नई दिल्ली- पब्लिक वार्ता, न्यूज़ डेस्क। WhatsApp New Rules 2025:भारत सरकार मैसेजिंग ऐप्स के लिए साइबर सुरक्षा नियमों को और सख्त करने जा रही है। Telecommunication Cybersecurity Amendment Rules, 2025 के तहत अब WhatsApp सहित सभी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स को एक्टिव SIM आधारित वेरिफिकेशन सिस्टम अपनाना होगा। नए नियम लागू होने के बाद WhatsApp उसी डिवाइस पर चलेगा जिसमें एक्टिव सिम कार्ड लगा होगा। बिना एक्टिव SIM नहीं चलेगा WhatsApp अब तक WhatsApp एक बार वेरिफिकेशन के बाद बिना किसी दोबारा जांच के चलता था, भले ही सिम फोन में हो या न हो।लेकिन नए नियमों के बाद ऐप को लगातार यह जांचना होगा कि सिम: अगर सिम हटाया गया, निष्क्रिय हुआ या बदल दिया गया तो WhatsApp तुरंत बंद हो जाएगा। WhatsApp Web पर हर 6 घंटे में होगा ऑटो लॉगआउट सरकार WhatsApp Web और Desktop App के लिए भी सिक्योरिटी बढ़ा रही है।प्रस्तावित नियमों के अनुसार: सरकार का मानना है कि इससे पब्लिक या ऑफिस कंप्यूटर पर खाते के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा। सभी मैसेजिंग ऐप्स पर लागू होगा नियम यह नियम सिर्फ WhatsApp पर नहीं, बल्कि इन पर भी लागू होगा: सभी प्लेटफॉर्म्स को 90 दिनों के अंदर एक्टिव SIM लिंकिंग सिस्टम लागू करना होगा। सरकार नए नियम क्यों ला रही है? डिजिटल फ्रॉड, फर्जी प्रोफाइल और ऑनलाइन स्कैम में तेजी आने के कारण सरकार साइबर सुरक्षा मजबूत करना चाहती है।सरकार का मानना है कि: Cellular Operators Association of India (COAI) के अनुसार मोबाइल नंबर भारत में सबसे भरोसेमंद पहचान है, इसलिए इसे सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनाया जा रहा है। कौन से यूजर्स होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित? भारत में 50 करोड़ से अधिक WhatsApp यूजर्स हैं।नियम लागू होने के बाद परेशानी इन यूजर्स को हो सकती है: क्या नए नियम वास्तव में असरदार होंगे? एक्सपर्ट्स की राय मिश्रित है।कुछ कहते हैं: लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं: आगे क्या? WhatsApp सहित सभी ऐप्स को नए नियम लागू करने के लिए 90 दिनों का समय दिया गया है।अगर सब कुछ समय पर लागू हुआ तो:

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